वन नेशन-वन इलेक्शन: 2029 में लागू करने की तैयारी? JPC बैठक, फायदे, विपक्ष के तर्क और राज्यों पर असर
देश में ‘एक देश-एक चुनाव’ (One Nation-One Election) को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। 129वें संविधान संशोधन बिल को लेकर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की बैठकों का दौर जारी है। JPC के अध्यक्ष पीपी चौधरी के नेतृत्व में हुई हालिया बैठक में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी, पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम, TMC सांसद सागरिका घोष और NCP (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले सहित कई प्रमुख विपक्षी नेताओं ने हिस्सा लिया।
बैठक के बाद JPC चेयरमैन ने दावा किया कि चर्चा में शामिल 99% स्टेकहोल्डर्स एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में हैं।
क्या 2029 में ही लागू होगा वन नेशन-वन इलेक्शन?
पहले जहां इसे 2034 तक लागू करने की चर्चा थी, वहीं अब रिपोर्टों के अनुसार मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इसे 2029 के लोकसभा चुनावों के साथ ही लागू किया जा सकता है। इसका मतलब है कि 2029 में देश भर में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं।
इतिहास: क्या भारत में पहले एक साथ चुनाव होते थे?
भारत में एक साथ चुनाव की व्यवस्था कोई नई नहीं है:
- आजादी के बाद 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही संपन्न हुए थे।
- 1967 के बाद कुछ राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग हुईं और वहां राष्ट्रपति शासन लगा।
- 1970 में लोकसभा भंग होने के बाद 1971-72 में समय से पहले चुनाव हुए, जिससे ‘एक साथ चुनाव’ का यह नियमित चक्र टूट गया।
पक्ष में तर्क और संभावित फायदे
समर्थकों और सरकार का मानना है कि बार-बार चुनाव होने से देश के विकास कार्यों पर असर पड़ता है:
- आर्थिक लाभ: बार-बार के चुनावी खर्चों में भारी कटौती होगी। अनुमानों के मुताबिक GDP में करीब 1.5% की अतिरिक्त बढ़त और महंगाई दर में 0.50% तक की कमी आ सकती है।
- विकास कार्यों में निरंतरता: आचार संहिता (Model Code of Conduct) के बार-बार लगने से सरकारी परियोजनाएं नहीं रुकेंगी।
- प्रशासनिक दक्षता: सुरक्षा बलों और प्रशासनिक मशीनरी पर बार-बार पड़ने वाला बोझ घटेगा।
- शिक्षा व्यवस्था को राहत: सरकारी शिक्षकों और स्कूल कर्मियों को बार-बार वोटर लिस्ट अपडेशन व पोलिंग ड्यूटी में नहीं लगना पड़ेगा, जिससे छात्रों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होगी।
विपक्ष के प्रमुख तर्क और आपत्तियां
विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव को लेकर कई संवैधानिक और व्यावहारिक चिंताएं जताई हैं:
- 5 वर्ष का निश्चित कार्यकाल संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा है।
- यदि किसी राज्य में 2-3 साल के भीतर सरकार गिर जाती है, तो बचे हुए कार्यकाल के लिए क्या व्यवस्था होगी?
- मध्यावधि चुनाव होने पर क्या विधानसभा का कार्यकाल केवल बचे हुए समय के लिए होगा या राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा?
- क्षेत्रीय मुद्दों के राष्ट्रीय मुद्दों के सामने दब जाने की आशंका।
2029 में लागू होने पर राज्यों की विधानसभाओं पर क्या असर पड़ेगा?
यदि 2029 में यह व्यवस्था लागू होती है, तो विभिन्न राज्यों के मौजूदा कार्यकाल में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा:
| श्रेणी | राज्य | संभावित प्रभाव |
| 2028 में चुनाव वाले राज्य | मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम | कार्यकाल 2033 तक होगा, लेकिन 2029 में चुनाव होने पर विधानसभाएं लगभग 4 साल पहले भंग करनी होंगी। |
| 2027 में चुनाव वाले राज्य | उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर | 2032 का कार्यकाल पूरा होने से 3 साल पहले ही 2029 में चुनाव कराने होंगे। |
| 2026 में चुनाव वाले राज्य | पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम, पुडुचेरी | 2031 का कार्यकाल पूरा होने से 2 साल पहले चुनाव होंगे। |
| 2025 में चुनाव वाले राज्य | दिल्ली, बिहार | 2030 का कार्यकाल पूरा होने से 1 साल पहले चुनाव कराने होंगे। |
| 2029 में सामान्य चुनाव वाले राज्य | महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश आदि | इन राज्यों के चुनाव चक्र पहले से ही लोकसभा के करीब हैं, अतः यहां ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। |
