FCRA संशोधन बिल 2026: विदेशी चंदे के नियमों में क्या बदल सकता है? जानिए पूरा मामला
नई दिल्ली: विदेशी चंदे से जुड़े फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) संशोधन विधेयक 2026 को सरकार ने 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया है। प्रस्तावित बदलावों को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर धार्मिक और सामाजिक संगठनों तक चर्चा तेज हो गई है।
सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाना, धन के इस्तेमाल की निगरानी मजबूत करना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से आने वाले पैसे का इस्तेमाल देश के हितों के खिलाफ न हो। वहीं, विपक्ष और कुछ धार्मिक संगठनों ने विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए हैं।
क्या है FCRA?
FCRA यानी Foreign Contribution Regulation Act, भारत में विदेश से मिलने वाले चंदे और विदेशी योगदान को नियंत्रित करने वाला कानून है। मौजूदा व्यवस्था FCRA, 2010 के तहत चलती है और इसे केंद्रीय गृह मंत्रालय लागू करता है।
इस कानून के दायरे में एनजीओ, ट्रस्ट, सोसायटी और अन्य पात्र संस्थाएं आती हैं। किसी संस्था को विदेश से चंदा प्राप्त करने के लिए FCRA के तहत रजिस्ट्रेशन कराना होता है। कुछ मामलों में संस्था किसी खास विदेशी दानदाता और निर्धारित उद्देश्य के लिए पूर्व अनुमति (Prior Permission) लेकर भी विदेशी योगदान प्राप्त कर सकती है।
विदेशी चंदे के लिए अलग बैंक खाता जरूरी
FCRA के तहत विदेशी योगदान प्राप्त करने वाली संस्थाओं के लिए बैंकिंग और रिकॉर्ड से जुड़े कई नियम निर्धारित हैं। विदेशी योगदान को निर्धारित FCRA बैंक खाते में प्राप्त करना होता है।
संस्था को विदेशी चंदे की प्राप्ति, उसके इस्तेमाल और खर्च का रिकॉर्ड भी रखना पड़ता है। इसके अलावा निर्धारित नियमों के अनुसार सरकार को इसकी जानकारी देनी होती है।
विदेशी चंदे का इस्तेमाल कहां किया जा सकता है?
FCRA के तहत विदेशी योगदान का इस्तेमाल कानून में निर्धारित सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और वैज्ञानिक गतिविधियों के लिए किया जा सकता है।
इनमें कई तरह के जनकल्याणकारी कार्य शामिल हैं, जैसे—
- स्कूल और शैक्षणिक संस्थान चलाना
- अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र संचालित करना
- अनाथालय और वृद्धाश्रम चलाना
- महिलाओं और बच्चों के कल्याण से जुड़े काम
- गरीब और जरूरतमंद लोगों की सहायता
- ग्रामीण विकास
- कौशल विकास और रोजगार से जुड़ी गतिविधियां
- कृषि और पशुपालन
- पर्यावरण संरक्षण
- वैज्ञानिक और सामाजिक शोध
- सांस्कृतिक गतिविधियां
- कानून के तहत अनुमत धार्मिक गतिविधियां
यानी विदेशी चंदे पर पूरी तरह रोक नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल कानून और निर्धारित उद्देश्य के अनुसार किया जाना जरूरी है।
किन कामों के लिए विदेशी चंदे का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता?
FCRA का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना भी है कि विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल भारत की संप्रभुता और अखंडता, सार्वजनिक हित या देश के रणनीतिक और आर्थिक हितों के खिलाफ न हो।
राजनीतिक दलों और कानून के तहत प्रतिबंधित राजनीतिक गतिविधियों के लिए विदेशी फंडिंग पर भी रोक है। इसके अलावा संस्था को विदेशी चंदे का इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए करना होता है, जिसके लिए उसे प्राप्त किया गया है।
नियमों का उल्लंघन होने पर सरकार कार्रवाई कर सकती है। इसमें जुर्माना, FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द होना और गंभीर मामलों में कानूनी कार्रवाई का प्रावधान हो सकता है।
संपत्तियों को लेकर क्यों बढ़ी बहस?
प्रस्तावित FCRA संशोधनों में विदेशी चंदे से खरीदी या बनाई गई संपत्तियों से जुड़े प्रावधानों को लेकर खास चर्चा हो रही है।
इसी मुद्दे पर विपक्ष और कुछ धार्मिक संगठनों की ओर से सवाल उठाए गए हैं। उनका तर्क है कि नए प्रावधानों का असर उन संस्थाओं की संपत्तियों और लंबे समय से चल रही गतिविधियों पर पड़ सकता है, जो FCRA के तहत विदेशी योगदान प्राप्त करती हैं।
दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि विदेशी फंडिंग की निगरानी और उसके इस्तेमाल में पारदर्शिता जरूरी है। सरकार के मुताबिक नियमों को मजबूत करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्यों और देशहित के अनुरूप ही हो।
अब आगे क्या होगा?
विधेयक को 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजे जाने के बाद समिति इसके प्रावधानों की समीक्षा करेगी। समिति विभिन्न पक्षों की राय सुन सकती है और अपनी रिपोर्ट संसद में पेश करेगी।
इसके बाद विधेयक की आगे की संसदीय प्रक्रिया पूरी होगी। इसलिए फिलहाल प्रस्तावित बदलावों को लेकर अंतिम तस्वीर संसदीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
निष्कर्ष
FCRA विदेशी चंदे को नियंत्रित करने वाला महत्वपूर्ण कानून है। इसका सीधा संबंध हजारों एनजीओ, ट्रस्ट, सोसायटी और अन्य संस्थाओं की विदेशी फंडिंग से है।
FCRA संशोधन विधेयक 2026 को JPC के पास भेजे जाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि विदेशी चंदे से जुड़ी संपत्तियों, फंड के इस्तेमाल और निगरानी के नियमों में आखिर कितना बदलाव होता है।
अब सभी की नजर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट और विधेयक की आगे की संसदीय प्रक्रिया पर है।
