5 सितंबर 1988: जब देश में अखबार नहीं छपे और 400+ सीटों वाली राजीव सरकार को झुकना पड़ा
1975 की इमरजेंसी के बाद देश में एक बार फिर मीडिया की आवाज को दबाने की गंभीर कोशिश हुई थी। दौर था 1988 का और सत्ता में थे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी। 1984 के चुनाव में 414 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ आई सरकार ने मीडिया की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए एक ऐसा कानून तैयार किया था, जिसे लोकतंत्र के इतिहास में ‘प्रेस पर दूसरी इमरजेंसी’ के रूप में देखा गया।
कानून की पृष्ठभूमि: बोफोर्स का साया और सरकार की बेचैनी
राजीव गांधी सरकार ने युवा मतदाताओं की उम्र 18 वर्ष करने, पंचायती राज और नई शिक्षा नीति जैसे कई बड़े कदम उठाए थे। लेकिन 1988 तक आते-आते सरकार विवादों में घिरने लगी:
- पूर्व रक्षा मंत्री वी.पी. सिंह द्वारा बोफोर्स तोप सौदे में दलाली के आरोपों का खुलासा।
- देश के बड़े अंग्रेजी और भाषाई अखबारों द्वारा लगातार खोजी रिपोर्टिंग।
- भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी सरकार और मीडिया के बीच बढ़ता टकराव।
इसी राजनीतिक दबाव के बीच 29 अगस्त 1988 को राजीव गांधी सरकार ने लोकसभा में मानहानि विधेयक (Defamation Bill, 1988) पेश किया।
विधेयक के विवादित प्रावधान
सरकार का दावा था कि यह कानून व्यक्तियों की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए है, लेकिन इसके कड़े प्रावधानों ने खोजी पत्रकारिता की रीढ़ पर सीधा हमला किया:
- सबूत का बोझ पत्रकार पर: सामान्य कानून के उलट, पत्रकार को ही यह साबित करना था कि उसकी खबर पूरी तरह सत्य और जनहित में है।
- कड़ी जेल की सजा: ‘निंदनीय लेखन’ (scurrilous writing) को गैर-जमानती और दंडनीय अपराध बनाया गया।
- संपादक-मुद्रक पर शिकंजा: सिर्फ लिखने वाले पर ही नहीं, बल्कि संपादक, प्रकाशक और प्रिंटर को भी कानूनी दायरे में घसीटने का नियम था।
- बंद कमरे में सुनवाई: अदालत की कार्यवाही को बंद कमरे (in-camera trial) में चलाने की व्यवस्था थी, जिससे पारदर्शिता पूरी तरह खत्म हो जाती।
- हड़बड़ी में पास: 29 अगस्त को पेश होने के महज 24 घंटे के भीतर भारी बहुमत के दम पर इसे लोकसभा से पारित करा लिया गया।
5 सितंबर 1988: जब एक भी अखबार नहीं बिका
लोकसभा से बिल पास होते ही पूरे देश का मीडिया जगत एकजुट हो गया।
- ऐतिहासिक हड़ताल: 5 सितंबर 1988 को देश के लगभग सभी अखबारों ने काम बंद कर दिया। अगली सुबह देश के किसी भी कोने में अखबार नहीं छपे।
- सड़कों पर विरोध: इंटरनेट और सोशल मीडिया के बिना भी संपादक, पत्रकार और प्रेस कर्मचारी एक साथ सड़कों पर उतरे।
- विपक्ष का समर्थन: समूचा विपक्ष और नागरिक संगठन प्रेस की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़े हो गए।
22 सितंबर: ऐतिहासिक बहुमत के सामने लोकतंत्र की जीत
देशव्यापी विरोध के आगे राजीव गांधी सरकार की एक न चली। पहले बातचीत से रास्ता निकालने की कोशिश की गई, लेकिन मीडिया संगठनों ने बिल को पूरी तरह खारिज करने की मांग रखी।
आखिरकार, 22 सितंबर 1988 को सरकार ने आधिकारिक रूप से मानहानि विधेयक वापस ले लिया।
यह घटना स्वतंत्र भारत के इतिहास का वह पन्ना है, जिसने साबित किया कि संसद में 400 से अधिक सांसदों का प्रचंड बहुमत भी स्वतंत्र प्रेस और एकजुट जनता के संकल्प के सामने टिक नहीं सकता।

