तिरंगे के पीछे 15 साल की जिद और सिर्फ 3 घंटे का काम: कौन थे पिंगली वेंकैया?
15 अगस्त को जब देशभर में तिरंगा शान से लहराता है, तो करोड़ों भारतीयों के दिल में देशभक्ति की भावना उमड़ पड़ती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज के पीछे किस व्यक्ति की सोच, मेहनत और जिद थी?
उस शख्स का नाम था पिंगली वेंकैया।
आजादी के बाद तिरंगा देश की पहचान बन गया, लेकिन इसे एक राष्ट्रीय प्रतीक का रूप देने की कहानी संघर्ष, प्रयोग और असफलताओं से भरी हुई थी। पिंगली वेंकैया ने वर्षों तक भारत के लिए एक ऐसे ध्वज की कल्पना की, जिसे देखकर हर भारतीय के भीतर गर्व की भावना पैदा हो।

दक्षिण अफ्रीका में मिली प्रेरणा
पिंगली वेंकैया का जन्म 2 अगस्त 1876 को हुआ था। युवावस्था में वह ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हुए और दक्षिण अफ्रीका भी गए। वहां उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों को यूनियन जैक को सलामी देते देखा।
यही दृश्य उनके मन में गहराई तक उतर गया।
उन्हें महसूस हुआ कि भारत के पास ऐसा अपना कोई राष्ट्रीय प्रतीक नहीं है, जिसके सामने भारतीय उसी गर्व के साथ खड़े हो सकें।
दक्षिण अफ्रीका में ही उनकी मुलाकात मोहनदास करमचंद गांधी से भी हुई। इसके बाद वेंकैया के मन में भारत के लिए अपने झंडे की कल्पना और मजबूत होती चली गई।
वर्षों तक करते रहे झंडे के डिजाइन पर काम
पिंगली वेंकैया ने अलग-अलग डिजाइन तैयार किए और उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं के सामने प्रस्तुत किया। वर्ष 1916 में उन्होंने भारत के लिए राष्ट्रीय ध्वज के अलग-अलग डिजाइनों वाली एक पुस्तक भी प्रकाशित की।
लेकिन उनके प्रयासों को तुरंत सफलता नहीं मिली।
1918, 1919 और 1920 के कांग्रेस अधिवेशनों में भी वह अपने डिजाइन लेकर पहुंचे, लेकिन कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी।
कई बार असफल होने के बावजूद वेंकैया ने अपना प्रयास नहीं छोड़ा।
सिर्फ तीन घंटे में तैयार हुआ एक नया झंडा
कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा आता है वर्ष 1921 में।
31 मार्च 1921 को विजयवाड़ा में कांग्रेस की बैठक के दौरान राष्ट्रीय ध्वज को लेकर चर्चा हुई। चरखे को झंडे में शामिल करने का सुझाव भी सामने आया।
महात्मा गांधी ने पिंगली वेंकैया से झंडे का डिजाइन तैयार करने को कहा।
वेंकैया कुछ ही घंटों में एक डिजाइन लेकर लौटे।
कहा जाता है कि उन्होंने खादी के कपड़े पर रंगों की पट्टियां और बीच में चरखे का प्रतीक रखा था। गांधी ने इस डिजाइन पर आगे विचार किया और बाद में इसमें बदलाव किए गए।
धीरे-धीरे ध्वज का स्वरूप विकसित होता गया और यह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।
1931 में बदला स्वरूप
साल 1931 में कांग्रेस ने एक नए स्वरूप वाले झंडे को अपनाया। इसमें केसरिया, सफेद और हरे रंग की पट्टियां थीं और बीच में चरखा था।
इसके बाद स्वतंत्रता के समय राष्ट्रीय ध्वज के स्वरूप को एक बार फिर बदला गया।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने भारत के वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया। इसमें चरखे की जगह अशोक चक्र को स्थान दिया गया।
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और तिरंगा स्वतंत्र भारत की पहचान बन गया।
जिस तिरंगे की कल्पना की, उसी के नीचे अंतिम इच्छा पूरी हुई
पिंगली वेंकैया का जीवन बेहद सादगी और संघर्ष में बीता। उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज की कल्पना को अपना जीवन समर्पित कर दिया, लेकिन स्वतंत्र भारत में उन्हें वह प्रसिद्धि नहीं मिली जिसके वे हकदार थे।
4 जुलाई 1963 को उनका निधन हो गया।
उनके जीवन की सबसे भावुक बात यह बताई जाती है कि उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनकी देह को तिरंगे में लपेटा जाए।
जिस ध्वज को पहचान दिलाने के लिए उन्होंने अपना जीवन लगा दिया, आखिर में वही तिरंगा उनकी अंतिम यात्रा का हिस्सा बना।
आज हर भारतीय को जानना चाहिए यह नाम
आज तिरंगा सिर्फ तीन रंगों और एक अशोक चक्र वाला कपड़ा नहीं है। यह भारत की स्वतंत्रता, एकता, संघर्ष और गौरव का प्रतीक है।
जब 15 अगस्त की सुबह देशभर में तिरंगा लहराता है, तो उसके पीछे उन अनगिनत लोगों की मेहनत और सपने भी याद आते हैं, जिन्होंने भारत को अपनी पहचान देने के लिए संघर्ष किया।
उनमें पिंगली वेंकैया का नाम बेहद खास है।
उन्होंने हमें यह सिखाया कि किसी बड़े बदलाव की शुरुआत हमेशा बड़ी चीज से नहीं होती। कभी-कभी एक विचार, कुछ असफल प्रयास और उसे पूरा करने की जिद ही इतिहास बदल देती है।
अगली बार जब आप तिरंगे को सलामी दें, तो पिंगली वेंकैया को भी जरूर याद कीजिएगा।
जय हिंद!
