अल नीनो की दस्तक से 2027 में खाद्य संकट का खतरा, क्या भारत भी आएगा चपेट में?
अल नीनो एक बार फिर दुनिया की चिंता बढ़ा रहा है। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर साल के अंत तक अल नीनो मजबूत रूप लेता है, तो इसका असर तापमान, बारिश और कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब 2027 में संभावित ग्लोबल फूड क्राइसिस यानी वैश्विक खाद्य संकट को लेकर चेतावनी दे रहे हैं।
अल नीनो दरअसल मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म होने की स्थिति है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ता है। कहीं सूखे का खतरा बढ़ता है तो कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति बन सकती है।
क्यों बढ़ रही है 2027 की चिंता?
खाद्य संकट का खतरा केवल अल नीनो की वजह से नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक, युद्ध, मौसम में बदलाव, पानी की कमी, खाद की महंगाई और कमजोर सप्लाई चेन जैसे कई कारक एक साथ दबाव बढ़ा रहे हैं।
जेपी मॉर्गन की एक रिपोर्ट में वैश्विक खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करने वाले पांच प्रमुख कारकों को ‘फाइव डब्ल्यू’ के तौर पर बताया गया है—War, Weather, Warehousing, Water और Waste।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि खाद्य महंगाई का दबाव 2027 की पहली छमाही तक बना रह सकता है। कुछ आकलनों में खाद्य महंगाई 2026 की पहली छमाही के करीब 2.8 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 5 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका जताई गई है।
भारत के लिए कितना बड़ा खतरा?
भारत के लिए चिंता की सबसे बड़ी वजह कमजोर मानसून और कृषि उत्पादन पर संभावित असर है। अल नीनो की मजबूत स्थिति में बारिश के पैटर्न में बदलाव हो सकता है, जिसका असर धान, गन्ने और दूसरी फसलों पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर चावल का उत्पादन और उपलब्धता प्रभावित होती है तो वैश्विक चावल कीमतों में 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि चावल घरेलू खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ देश के कृषि निर्यात का भी बड़ा हिस्सा है।
गन्ने की पैदावार पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। उत्पादन घटने पर चीनी की कीमतों और उससे जुड़े खाद्य उत्पादों की महंगाई बढ़ सकती है।
सिर्फ खेती नहीं, सप्लाई चेन भी हो सकती है प्रभावित
अल नीनो का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रह सकता। मौसम संबंधी बदलाव से जल परिवहन, बंदरगाहों और वैश्विक सप्लाई चेन पर भी दबाव बढ़ सकता है।
पनामा नहर जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में जलस्तर कम होने पर जहाजों की क्षमता सीमित हो सकती है। इससे परिवहन लागत बढ़ती है और खाद्य पदार्थों को एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाना महंगा हो सकता है।
इसके अलावा युद्ध और उर्वरकों की आपूर्ति में बाधा किसानों की लागत बढ़ा सकती है। अगर खाद और ईंधन महंगे होते हैं तो अगली फसल की लागत भी बढ़ सकती है।
क्या भारत में महंगा हो सकता है खाना?
अगर मजबूत अल नीनो, कमजोर मानसून, कम कृषि उत्पादन और वैश्विक सप्लाई चेन में व्यवधान एक साथ सामने आते हैं, तो भारत में भी कुछ खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में निश्चित रूप से खाद्य संकट आने वाला है। सरकारी खाद्य भंडार, आयात-निर्यात नीतियां, मानसून की वास्तविक स्थिति और फसल उत्पादन जैसे कई कारक अंतिम असर तय करेंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो का असर खुदरा बाजार में तुरंत दिखाई नहीं देता। शुरुआती दौर में सरकारी भंडार, पुराने अनुबंध और बाजार की हेजिंग व्यवस्था कीमतों को नियंत्रित रख सकती है। लेकिन अगर नई फसल प्रभावित होती है और भंडार कम होने लगते हैं, तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
2027 क्यों हो सकता है अहम?
पिछले अल नीनो घटनाक्रमों के अनुभव बताते हैं कि इसका सबसे गंभीर आर्थिक असर हमेशा उसी साल नहीं दिखाई देता, जब अल नीनो चरम पर होता है। कृषि उत्पादन, भंडारण और सप्लाई चेन पर पड़ने वाले प्रभाव अगले साल तक भी बने रह सकते हैं।
इसी वजह से विशेषज्ञ 2027 को वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साल मान रहे हैं।
फिलहाल भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले महीनों में अल नीनो कितना मजबूत होता है और इसका असर मानसून तथा कृषि उत्पादन पर कितना पड़ता है। अगर मौसम, युद्ध और सप्लाई चेन से जुड़े जोखिम एक साथ बढ़ते हैं, तो दुनिया के साथ भारत के सामने भी खाद्य महंगाई की चुनौती बड़ी हो सकती है।
