राजनीति में बढ़ती उम्र का सवाल: क्या लोकतंत्र युवा पीढ़ी से दूर होता जा रहा है?
दुनिया भर की राजनीति पर नजर डालें तो एक बड़ा असंतुलन दिखाई देता है। वैश्विक आबादी की औसत उम्र करीब 30 वर्ष है, लेकिन दुनिया के राजनीतिक नेताओं की औसत उम्र इससे दोगुने से भी ज्यादा है। यानी जिस दुनिया में युवा आबादी की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है, उस दुनिया के फैसले लेने वाले संस्थानों में उम्रदराज नेताओं का दबदबा कायम है।
इसी विरोधाभास ने राजनीति में ‘वृद्धतंत्र’ यानी Gerontocracy की बहस को तेज कर दिया है।
दुनिया की युवा आबादी, लेकिन उम्रदराज नेतृत्व
राजनीति में उम्र का यह अंतर कई देशों में साफ दिखाई देता है। कुछ देशों में अपेक्षाकृत युवा नेता सत्ता में हैं, लेकिन वैश्विक तस्वीर अब भी बुजुर्ग नेतृत्व की ओर झुकी हुई है।
कैमरून के पॉल बिया और सऊदी अरब के किंग सलमान जैसे बेहद उम्रदराज नेता इसके प्रमुख उदाहरण हैं। वहीं अमेरिका और भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में भी शीर्ष नेतृत्व की उम्र वैश्विक आबादी की औसत उम्र की तुलना में काफी अधिक है।
सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है?
अगर किसी बड़ी कंपनी में 80 या 90 वर्ष की उम्र का व्यक्ति नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल रहा हो तो इसे असामान्य माना जा सकता है। लेकिन राजनीति में उम्रदराज नेतृत्व को अक्सर अनुभव और स्थिरता से जोड़कर देखा जाता है।
क्या युवा नेता मतदाताओं की पसंद नहीं हैं?
राजनीतिक वैज्ञानिक एक्सल सुंदरस्ट्रॉम के अनुसार, समस्या यह नहीं है कि मतदाता युवा नेताओं को पसंद नहीं करते। असली समस्या राजनीतिक व्यवस्था में छिपी है।
राजनीति में चुनाव लड़ना लगातार महंगा और कठिन होता जा रहा है। चुनाव अभियान, संगठन, पार्टी के भीतर जगह बनाना और राजनीतिक नेटवर्क तैयार करना—इन सबमें काफी समय और संसाधन लगते हैं।
नतीजा यह होता है कि जिन लोगों के पास पहले से राजनीतिक अनुभव, संसाधन और संगठनात्मक पकड़ है, उन्हें लगातार फायदा मिलता रहता है।
युवा उम्मीदवारों के लिए इस व्यवस्था में प्रवेश करना आसान नहीं होता।
अनुभव बनाम नई सोच
लोकतंत्र में लंबे राजनीतिक अनुभव को अक्सर योग्यता का प्रमाण माना जाता है। निश्चित रूप से अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल अनुभव के आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व तय होना चाहिए?
आज की युवा पीढ़ी जिन चुनौतियों का सामना कर रही है, वे पिछली पीढ़ियों से काफी अलग हैं।
रोजगार का बदलता स्वरूप, महंगी शिक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य, स्टार्टअप और नई तकनीक जैसे मुद्दे युवाओं के भविष्य से सीधे जुड़े हैं।
ऐसे में राजनीति में युवाओं की पर्याप्त भागीदारी यह सुनिश्चित कर सकती है कि इन मुद्दों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक मजबूती से जगह मिले।
शोध ने क्या बताया?
एक्सल सुंदरस्ट्रॉम, चार्ल्स टी. मैकलीन और डेनियल स्टोकेमर के 2026 के अध्ययन ने अमेरिका और ब्रिटेन में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक भरोसे के बीच उम्र के संबंध को समझने की कोशिश की।
अध्ययन में पाया गया कि जिन विधायी संस्थाओं में वरिष्ठ नेताओं के साथ 40 वर्ष से कम उम्र के नेताओं का संतुलित प्रतिनिधित्व था, वहां जनता का भरोसा अपेक्षाकृत अधिक था।
अमेरिका में मिश्रित उम्र वाले विधायी निकायों पर प्रक्रियाओं की निष्पक्षता को लेकर भरोसा केवल बुजुर्ग सदस्यों वाले निकायों की तुलना में 21 प्रतिशत अंक अधिक था। ब्रिटेन में यह अंतर 47 प्रतिशत अंक तक पहुंच गया।
भविष्य से जुड़े फैसलों को लेकर भी मिश्रित उम्र वाले निकायों पर जनता का भरोसा अधिक पाया गया।
इसका सबसे बड़ा असर 18 से 34 वर्ष की उम्र के लोगों के बीच देखने को मिला।
युवा नेता क्यों जरूरी हैं?
शोध में शामिल लोगों के एक बड़े हिस्से का मानना था कि युवा नेता आधुनिक जीवन की बदलती वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
रोजगार की अनिश्चितता, शिक्षा का बढ़ता खर्च, डिजिटल दुनिया और तकनीक से जुड़े बदलाव युवाओं के रोजमर्रा के अनुभव का हिस्सा हैं।
इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, तकनीकी विकास और आने वाली पीढ़ियों के लिए नीतियां बनाने जैसे दीर्घकालिक मुद्दे भी युवा मतदाताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
कुछ राजनीतिक अध्ययनों में यह भी संकेत मिला है कि उम्र बढ़ने के साथ राजनेताओं के भाषणों और विधायी कामकाज में भविष्य से जुड़ी भाषा का इस्तेमाल कम हो सकता है। इसके चलते राजनीति कभी-कभी दीर्घकालिक चुनौतियों के बजाय तत्काल राजनीतिक लाभ और मौजूदा समस्याओं पर अधिक केंद्रित हो जाती है।
भारत में भी बड़ा सवाल
भारत की औसत उम्र करीब 28 वर्ष है, लेकिन संसद में युवा आबादी की तुलना में उम्रदराज सांसदों का प्रतिनिधित्व काफी अधिक है।
भारत में उम्र और राजनीतिक नेतृत्व की बहस उस समय और दिलचस्प हो जाती है जब पार्टियां खुद उम्र को लेकर अलग-अलग मानदंड तय करती रही हैं।
2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी में 75 वर्ष से अधिक उम्र के नेताओं को सक्रिय राजनीति से दूर रखने की नीति की चर्चा हुई थी। लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय चुनावी राजनीति से अलग किया गया।
लेकिन उम्र की यह बहस तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब राजनीतिक दलों के अपने नेताओं के लिए अलग-अलग मानदंड दिखाई देते हैं।
यही सवाल लोकतंत्र के सामने भी है—क्या उम्र की सीमा समाधान है या फिर राजनीतिक संस्थाओं में पीढ़ियों के बीच संतुलन बनाना ज्यादा जरूरी है?
क्या उम्र का कोटा समाधान है?
कुछ देशों में संसद और राजनीतिक उम्मीदवारों की सूची में युवाओं के लिए कोटा लागू किए गए हैं। लेकिन केवल कोटा लागू कर देने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती।
कई बार ऐसे प्रावधानों का इस्तेमाल सत्ता में पहले से मौजूद राजनीतिक वर्ग अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने के लिए भी कर सकता है।
इसलिए जरूरी है कि युवा प्रतिनिधित्व केवल संख्या तक सीमित न रहे। युवाओं को पार्टी संगठन, नीति निर्माण और महत्वपूर्ण निर्णय लेने की प्रक्रिया में वास्तविक अधिकार भी मिलें।
राजनीति और युवाओं के बीच बढ़ती दूरी
जब किसी देश की बड़ी युवा आबादी को यह महसूस होने लगे कि राजनीतिक संस्थाओं में उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही, तो लोकतंत्र पर उसका भरोसा कमजोर हो सकता है।
यही वजह है कि दुनिया के कई हिस्सों में युवा पीढ़ी पारंपरिक राजनीति से दूरी बनाती दिखाई देती है। कई जगह युवा चुनावी राजनीति से उदासीन हो रहे हैं, तो कई जगह वे विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों के जरिए अपनी आवाज उठा रहे हैं।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए गंभीर संकेत है।
क्योंकि लोकतंत्र केवल मतदान करने का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र का मतलब यह भी है कि समाज के अलग-अलग वर्गों और पीढ़ियों की आवाज सत्ता के फैसलों में दिखाई दे।
क्या राजनीति को युवा बनाना जरूरी है?
युवा नेताओं को जगह देना किसी पीढ़ी पर एहसान नहीं है। यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को बेहतर बनाने की जरूरत है।
इसका अर्थ यह भी नहीं है कि उम्रदराज नेताओं को राजनीति से बाहर कर दिया जाए। अनुभव और नई सोच—दोनों की अपनी अहमियत है।
असल जरूरत एक ऐसे राजनीतिक ढांचे की है जहां वरिष्ठ नेताओं का अनुभव और युवा नेताओं की नई दृष्टि साथ-साथ काम कर सके।
क्योंकि दुनिया की आबादी तेजी से बदल रही है। तकनीक बदल रही है, रोजगार बदल रहा है, जलवायु बदल रही है और समाज की प्राथमिकताएं बदल रही हैं।
ऐसे में राजनीति अगर लगातार पुरानी होती जाएगी, तो क्या वह बदलती दुनिया की जरूरतों का सही प्रतिनिधित्व कर पाएगी?
यही आज लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा सवाल है—क्या सत्ता में अनुभव और युवा सोच के बीच सही संतुलन बनाया जा सकता है?
और शायद इस सवाल का जवाब आने वाले वर्षों की राजनीति की दिशा तय करेगा।
