जंतर-मंतर से इंस्टाग्राम तक: क्या बदल गया बीजेपी की आईटी सेल और Gen-Z के बीच सोशल मीडिया का मुकाबला?

0
bjp news

bjp news

करीब छह साल पहले, जब देश कोरोना महामारी के शुरुआती दौर से बाहर निकल रहा था, तब बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार से जुड़े मुद्दों को लेकर युवाओं में नाराजगी बढ़ रही थी। सोशल मीडिया इस नाराजगी को सामने लाने का बड़ा माध्यम बना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वीडियो पर बड़ी संख्या में डिसलाइक और सोशल मीडिया पर ‘राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस’ जैसे ट्रेंड इसी डिजिटल असंतोष की तस्वीर पेश कर रहे थे।

उस समय बीजेपी की आईटी सेल ने सोशल मीडिया पर हो रही इस गतिविधि को कथित तौर पर विदेशी बॉट्स से जोड़ने की कोशिश की। लेकिन युवाओं ने अपने कमेंट्स में अपने गांव-कस्बों के नाम लिखकर इस दावे का मजाक उड़ाया। इस तरह सोशल मीडिया पर सरकार और युवाओं के बीच एक नई तरह की राजनीतिक भिड़ंत दिखाई देने लगी।

छह साल बाद परिस्थितियां कुछ अलग नजर आईं। इस बार जंतर-मंतर पर छात्रों और युवाओं के आंदोलन ने सोशल मीडिया की ताकत को एक नए अंदाज में सामने रखा। खास बात यह रही कि आंदोलन से जुड़े युवाओं ने पारंपरिक राजनीतिक भाषा के बजाय मीम, रील, ह्यूमर और वायरल ट्रेंड्स को अपना हथियार बनाया।

सोशल मीडिया से शुरू हुआ आंदोलन

जून-जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन की चर्चा इंटरनेट और सोशल मीडिया से शुरू हुई। इसी दौरान ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम का एक ऑनलाइन संगठन भी चर्चा में आया।

इस समूह से जुड़े युवाओं में एक समानता दिखाई देती थी—वे युवा थे और इंटरनेट की मीम संस्कृति से अच्छी तरह परिचित थे। उनके विरोध का तरीका भी पारंपरिक राजनीतिक आंदोलनों से काफी अलग था।

प्रदर्शन के दौरान तिरंगा, फूल और किताबें लेकर राष्ट्रगान गाने से लेकर सोशल मीडिया पर मजेदार रील बनाने तक, युवाओं ने अपने खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों का जवाब उसी भाषा में देने की कोशिश की जिसे वे सबसे अच्छी तरह समझते थे।

‘विदेशी फंडिंग’ जैसे आरोपों के जवाब में मीम बनाए गए। पुलिस और आंदोलन से जुड़ी घटनाओं को भी रील और शॉर्ट वीडियो के रूप में सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया। प्रदर्शन स्थल की सफाई, रात में पहरेदारी और फुटपाथ पर सोने जैसी गतिविधियां भी कैमरे में रिकॉर्ड हुईं और इंटरनेट पर पहुंचीं।

बीजेपी आईटी सेल के पुराने फॉर्मूले

राजनीतिक सोशल मीडिया की बहस में बीजेपी की आईटी सेल लंबे समय से एक संगठित डिजिटल नेटवर्क के तौर पर चर्चा में रही है। प्रदर्शनकारियों को ‘एंटी-नेशनल’, ‘एंटी-हिंदू’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘अर्बन नक्सल’ या ‘खालिस्तानी’ जैसे तमगों से जोड़ना इसके आलोचकों द्वारा बताए जाने वाले प्रमुख नैरेटिव में शामिल रहा है।

इसके अलावा किसी आंदोलन को विदेशी फंडिंग से जोड़ना, पुराने वीडियो या एडिटेड क्लिप साझा करना और प्रदर्शन के मूल मुद्दे से ध्यान हटाकर हिंसा, पुलिस या आम लोगों को हो रही परेशानी पर बहस केंद्रित करना भी राजनीतिक सोशल मीडिया की आम रणनीतियों में गिना जाता है।

लेकिन जंतर-मंतर के इस आंदोलन में इन फॉर्मूलों का असर पहले की तुलना में सीमित दिखाई दिया।

इसकी एक बड़ी वजह आंदोलन से जुड़े युवाओं का सोशल मीडिया व्यवहार था। वे आरोपों का जवाब लंबी राजनीतिक बहस से नहीं बल्कि मीम और व्यंग्य से दे रहे थे।

जब आंदोलन बना मीम फेस्टिवल

प्रदर्शन के दौरान कई ऐसी गतिविधियां देखने को मिलीं जो सामान्य राजनीतिक आंदोलनों में असामान्य मानी जा सकती हैं।

कहीं मेलोडी टॉफी बांटी गई, कहीं कोई प्रदर्शनकारी गोरिल्ला की ड्रेस में नजर आया तो कहीं प्रधानमंत्री के पुराने बयानों को स्पीकर पर बजाया गया। पोस्टर और बैनर भी गंभीर राजनीतिक नारों के बजाय इंटरनेट मीम्स की शैली में तैयार किए गए।

इन गतिविधियों को जब रील्स और शॉर्ट वीडियो का रूप मिला तो उनका प्रभाव जंतर-मंतर की सीमा से कहीं आगे पहुंच गया।

यही Gen-Z की सबसे बड़ी ताकत बनी—वह राजनीतिक संदेश को मनोरंजन, ह्यूमर और मीम कल्चर के साथ मिलाकर पेश कर रही थी।

फेसबुक की राजनीति बनाम इंस्टाग्राम की भाषा

सोशल मीडिया विशेषज्ञों के मुताबिक फेसबुक और इंस्टाग्राम पर राजनीतिक संचार का तरीका एक जैसा नहीं है।

फेसबुक पर लंबा पोस्ट, तस्वीर और नारा अभी भी काम कर सकता है। लेकिन इंस्टाग्राम पर कुछ सेकंड में ध्यान खींचना जरूरी होता है। यहां वीडियो का हुक, एडिटिंग, म्यूजिक, मीम, ट्रेंड और प्रस्तुति बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

Gen-Z इसी वातावरण में बड़ी हुई है।

इसलिए जब पारंपरिक राजनीतिक सोशल मीडिया रणनीति का सामना रील और मीम संस्कृति से हुआ तो दोनों पक्षों के बीच भाषा का अंतर साफ दिखाई देने लगा।

एक तरफ राजनीतिक संदेशों की पुरानी शैली थी, तो दूसरी तरफ युवा अपने विरोध को वायरल मनोरंजन में बदल रहे थे।

प्रधानमंत्री की रील और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंस्टाग्राम रील्स को लेकर भी सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हुई। उनके वीडियो पर बड़ी संख्या में व्यूज आए, लेकिन व्यूज की संख्या और सकारात्मक लोकप्रियता को एक ही चीज मानना सही नहीं है।

इन रील्स पर युवाओं ने कैमरा एंगल, बोलने के अंदाज और इस्तेमाल किए गए शब्दों को लेकर मीम और पैरोडी तैयार किए। सोशल मीडिया पर इस तरह की प्रतिक्रियाओं ने यह दिखाया कि बड़ी संख्या में व्यूज मिलने के बावजूद किसी राजनीतिक कंटेंट की स्वीकार्यता को केवल व्यूज से मापना मुश्किल है।

Gen-Z ने यहां भी आलोचना का अपना पसंदीदा हथियार इस्तेमाल किया—ह्यूमर।

जमीन पर शांत, इंटरनेट पर आक्रामक

इस आंदोलन की एक दिलचस्प विशेषता यह भी रही कि प्रदर्शनकारी जमीन पर अपेक्षाकृत अहिंसक और अनुशासित नजर आने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सोशल मीडिया पर उनकी भाषा कहीं ज्यादा आक्रामक और व्यंग्यात्मक थी।

पुलिस कार्रवाई हो या राजनीतिक बयान, हर घटना को मीम और रील में बदलने की कोशिश की गई।

फिट-चेक से लेकर पुलिसकर्मियों के साथ मजाकिया संवाद तक, आंदोलनकारियों ने इंटरनेट की भाषा में अपनी बात रखने का प्रयास किया।

यह तरीका पुरानी पीढ़ी के राजनीतिक आंदोलनों से काफी अलग था।

Gen-Z को ट्रोल करना आसान नहीं

सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस करने वाले कई लोगों का मानना है कि Gen-Z पारंपरिक ऑनलाइन ट्रोलिंग से उतनी आसानी से प्रभावित नहीं होती।

इस पीढ़ी के लिए मीम, व्यंग्य और ऑनलाइन मजाक रोजमर्रा की डिजिटल संस्कृति का हिस्सा हैं। इसलिए जब उन्हें किसी राजनीतिक लेबल से निशाना बनाया जाता है तो वे अक्सर उसी लेबल को मजाक में बदलकर वापस इस्तेमाल कर देते हैं।

यही वजह है कि ‘एंटी-नेशनल’ या ‘विदेशी फंडिंग’ जैसे आरोपों को भी कुछ युवाओं ने गंभीर राजनीतिक बचाव के बजाय मीम में बदल दिया।

इंटरनेट बंद होने के बावजूद जारी रहा डिजिटल आंदोलन

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में इंटरनेट से जुड़ी पाबंदियों के बावजूद आंदोलन की डिजिटल मौजूदगी बनी रही।

वीडियो रिकॉर्ड किए गए, बाद में उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया और आंदोलन की घटनाएं लगातार ऑनलाइन चर्चा का हिस्सा बनी रहीं।

इससे यह भी पता चलता है कि आज का आंदोलन केवल सड़क पर मौजूद लोगों तक सीमित नहीं रहता। उसका दूसरा मैदान इंटरनेट होता है, जहां कुछ सेकंड का वीडियो हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों तक पहुंच सकता है।

क्या बीजेपी की आईटी सेल कमजोर हुई है?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि बीजेपी की आईटी सेल पूरी तरह प्रभावहीन हो गई है। राजनीतिक सोशल मीडिया में बीजेपी का नेटवर्क अभी भी काफी मजबूत माना जाता है, खासकर व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म पर।

लेकिन जंतर-मंतर का घटनाक्रम यह जरूर दिखाता है कि सोशल मीडिया का मैदान तेजी से बदल रहा है।

एक समय फेसबुक और ट्विटर राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई के प्रमुख प्लेटफॉर्म थे। अब इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और मीम पेज भी राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर रहे हैं।

यानी अब केवल यह मायने नहीं रखता कि आपके पास कितना बड़ा डिजिटल नेटवर्क है। यह भी मायने रखता है कि आप उस प्लेटफॉर्म की भाषा को कितना समझते हैं।

अगली पीढ़ी और बदलती डिजिटल राजनीति

इस बदलाव का असर आने वाले वर्षों में और बड़ा हो सकता है।

जो बच्चे आज इंस्टाग्राम और शॉर्ट वीडियो के साथ बड़े हो रहे हैं, वे आने वाले समय में पहली बार मतदान करने वाली पीढ़ी का हिस्सा बनेंगे। उनके लिए राजनीतिक जानकारी हासिल करने का तरीका पिछली पीढ़ियों से काफी अलग हो सकता है।

वे अखबार की हेडलाइन या टीवी डिबेट से पहले किसी रील, मीम या शॉर्ट वीडियो के जरिए किसी मुद्दे से परिचित हो सकते हैं।

ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए चुनौती केवल सोशल मीडिया पर मौजूद रहना नहीं है। चुनौती यह है कि वे बदलती डिजिटल भाषा को समझें और युवाओं से संवाद करने का तरीका भी बदलें।

जंतर-मंतर का यह घटनाक्रम इसी बड़े बदलाव की एक झलक माना जा सकता है।

राजनीतिक सोशल मीडिया की अगली लड़ाई शायद भाषणों और लंबे पोस्टों से कम और 30 सेकंड की रील, एक मीम और एक वायरल ट्रेंड से ज्यादा लड़ी जाएगी।

Please follow and like us:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed